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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
नन्दय़न्सुहृदः सर्वाञ्शात्रवांश्चावभर्त्सय़न् |  २६   क
कण्ठे चैनं परिष्वज्य गम्यतामित्युवाच ह ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति