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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुः शैघ्र्यमथो जह्याद्धिमवांश्च परिव्रजेत् |  ३०   क
शुष्येत्तोय़ं समुद्रेषु वह्निरप्युष्णतां त्यजेत् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति