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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
न चाहं त्वदृते राजन्प्रशासेय़ं वसुन्धराम् |  ३१   क
पुनः पुनः प्रसीदेति वाक्यं चेदमुवाच ह |  ३१   ख
त्वमेव नः कुले राजा भविष्यसि शतं समाः ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति