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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
विषीदथः किं कौरव्यौ वालिश्यात्प्राकृताविव |  ३४   क
न शोकः शोचमानस्य विनिवर्तेत कस्यचित् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति