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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
कर्तव्यं हि कृतं राजन्पाण्डवैस्तव मोक्षणम् |  ३६   क
नित्यमेव प्रिय़ं कार्यं राज्ञो विषय़वासिभिः |  ३६   ख
पाल्यमानास्त्वय़ा ते हि निवसन्ति गतज्वराः ||  ३६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति