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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
राजन्नद्यावगच्छामि तवेह लघुसत्त्वताम् |  ३८   क
किमत्र चित्रं यद्वीर मोक्षितः पाण्डवैरसि |  ३८   ख
सद्यो वशं समापन्नः शत्रूणां शत्रुकर्शन ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति