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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवेय़ानि रत्नानि त्वमद्याप्युपभुञ्जसे |  ४५   क
सत्त्वस्थान्पाण्डवान्पश्य न ते प्राय़मुपाविशन् |  ४५   ख
उत्तिष्ठ राजन्भद्रं ते न चिन्तां कर्तुमर्हसि ||  ४५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति