शान्ति पर्व  अध्याय २३९

शुक उवाच

अध्यात्मं विस्तरेणेह पुनरेव वदस्व मे |  १   क
यदध्यात्मं यथा चेदं भगवन्नृषिसत्तम ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति