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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
मनसापि गुरोर्भार्यां यः शिष्यो याति पापकृत् |  ४७   क
सोऽधमान्याति संसारानधर्मेणेह चेतसा ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति