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आदि पर्व
अध्याय ५३
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सूत उवाच
एतच्छ्रुत्वा प्रीय़माणाः समेता; ये तत्रासन्पन्नगा वीतमोहाः |  १८   क
तेऽऽस्तीके वै प्रीतिमन्तो वभूवु; रूचुश्चैनं वरमिष्टं वृणीष्व ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति