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वन पर्व
अध्याय २३९
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वैशम्पाय़न उवाच
सुहृदां चैव तच्छ्रुत्वा समन्युरिदमव्रवीत् |  १२   क
न धर्मधनसौख्येन नैश्वर्येण न चाज्ञय़ा |  १२   ख
नैव भोगैश्च मे कार्यं मा विहन्यत गच्छत ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति