वन पर्व  अध्याय २३९

वैशम्पाय़न उवाच

त एवमुक्ताः प्रत्यूचू राजानमरिमर्दनम् |  १४   क
या गतिस्तव राजेन्द्र सास्माकमपि भारत |  १४   ख
कथं वा सम्प्रवेक्ष्यामस्त्वद्विहीनाः पुरं वय़म् ||  १४   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति