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वन पर्व
अध्याय २३९
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वैशम्पाय़न उवाच
स सुहृद्भिरमात्यैश्च भ्रातृभिः स्वजनेन च |  १५   क
वहुप्रकारमप्युक्तो निश्चय़ान्न व्यचाल्यत ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति