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वन पर्व
अध्याय २८८
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कुन्त्यु उवाच
विस्रव्धो भव राजेन्द्र न व्यलीकं द्विजोत्तमः |  ५   क
वसन्प्राप्स्यति ते गेहे सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति