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वन पर्व
अध्याय २३९
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वैशम्पाय़न उवाच
ते स्वपक्षक्षय़ं तं तु ज्ञात्वा दुर्योधनस्य वै |  १९   क
आह्वानाय़ तदा चक्रुः कर्म वैतानसम्भवम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति