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वन पर्व
अध्याय २३९
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वैशम्पाय़न उवाच
सत्कृतस्य हि ते शोको विपरीते कथं भवेत् |  ५   क
मा कृतं शोभनं पार्थैः शोकमालम्व्य नाशय़ ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति