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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
तथा दौत्येन सम्प्राप्तः कृष्णः पार्थहिते रतः |  ८   क
प्रलव्धश्च हृषीकेशस्तच्च कर्म विरोधितम् |  ८   ख
स च मे वचनं व्रह्मन्कथमेवाभिमंस्यते ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति