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आदि पर्व
अध्याय २४
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सूत उवाच
स तान्निषादानुपसंहरंस्तदा; रजः समुद्धूय़ नभःस्पृशं महत् |  ११   क
समुद्रकुक्षौ च विशोषय़न्पय़ः; समीपगान्भूमिधरान्विचालय़न् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति