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वन पर्व
अध्याय २९२
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वैशम्पाय़न उवाच
रक्षन्तु त्वां सुराः सर्वे समेषु विषमेषु च |  १५   क
वेत्स्यामि त्वां विदेशेऽपि कवचेनोपसूचितम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति