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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
प्रभाते राजसमितौ सञ्जय़ो यत्र चाभिभोः |  १४४   क
ऐकात्म्यं वासुदेवस्य प्रोक्तवानर्जुनस्य च ||  १४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति