शान्ति पर्व  अध्याय २४

शङ्ख उवाच

स गत्वा वाहुदां शीघ्रं तर्पय़स्व यथाविधि |  २२   क
देवान्पितॄनृषींश्चैव मा चाधर्मे मनः कृथाः ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति