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उद्योग पर्व
अध्याय १२२
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्तु निःश्रेय़सं श्रुत्वा प्राप्तमेवाभिपद्यते |  २२   क
आत्मनो मतमुत्सृज्य स लोके सुखमेधते ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति