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शान्ति पर्व
अध्याय १४७
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शौनक उवाच
छित्त्वा स्तम्भं च मानं च प्रीतिमिच्छामि ते नृप |  १६   क
सर्वभूतहिते तिष्ठ धर्मं चैव प्रतिस्मर ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति