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अनुशासन पर्व
अध्याय २४
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भीष्म उवाच
ऋणकर्ता च यो राजन्यश्च वार्धुषिको द्विजः |  २२   क
प्राणिविक्रय़वृत्तिश्च राजन्नार्हन्ति केतनम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति