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अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
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नाचिकेत उवाच
इत्युक्तोऽहं धर्मराज्ञा महर्षे; धर्मात्मानं शिरसाभिप्रणम्य |  ५६   क
अनुज्ञातस्तेन वैवस्वतेन; प्रत्यागमं भगवत्पादमूलम् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति