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भीष्म पर्व
अध्याय ११६
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सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा मन्युमुपशाम्यस्व पार्थैः; पर्याप्तमेतद्यत्कृतं फल्गुनेन |  ४७   क
भीष्मस्यान्तादस्तु वः सौहृदं वा; सम्प्रश्लेषः साधु राजन्प्रसीद ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति