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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
तथा व्रुवाणं गाङ्गेय़ं प्रीतिय़ुक्तं पुनः पुनः |  ५७   क
उवाच वाक्यं दीनात्मा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति