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द्रोण पर्व
अध्याय १५३
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सञ्जय़ उवाच
पलाशैररिमेदैश्च प्लक्षन्यग्रोधपिप्पलैः |  २५   क
महद्भिः समरे तस्मिन्नन्योन्यमभिजघ्नतुः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति