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महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
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युधिष्ठिर उवाच
भक्तत्यागं प्राहुरत्यन्तपापं; तुल्यं लोके व्रह्मवध्याकृतेन |  ११   क
तस्मान्नाहं जातु कथञ्चनाद्य; त्यक्ष्याम्येनं स्वसुखार्थी महेन्द्र ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति