शान्ति पर्व  अध्याय १४९

गृध्र उवाच

मोक्षधर्माश्रितैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिरनिष्ठुरैः |  ५८   क
मय़ोक्ता गच्छत क्षिप्रं स्वं स्वमेव निवेशनम् ||  ५८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति