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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रादुष्कृता यथान्याय़मग्नय़ो वेदपारगैः |  १७   क
व्यराजन्त द्विजश्रेष्ठैस्तत्र तत्र तपोधनैः |  १७   ख
प्रादुष्कृताग्निरभवत्स च वृद्धो नराधिपः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति