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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
स राजाग्नीन्पर्युपास्य हुत्वा च विधिवत्तदा |  १८   क
सन्ध्यागतं सहस्रांशुमुपातिष्ठत भारत ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति