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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याः संनिकर्षे तु निषसाद कुशेष्वथ |  २०   क
युधिष्ठिरस्य जननी कुन्ती साधुव्रते स्थिता ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति