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भीष्म पर्व
अध्याय ८२
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सञ्जय़ उवाच
तं चरन्तं रणे पार्था ददृशुः कौरवं युधि |  १८   क
मृगमध्यं प्रविश्येव यथा सिंहशिशुं वने ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति