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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
मद्राधिपश्चापि विमूढचेता; स्तूर्णं रथेनापहृतध्वजेन |  ७   क
दुर्योधनस्यान्तिकमेत्य शीघ्रं; सम्भाष्य दुःखार्तमुवाच वाक्यम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति