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वन पर्व
अध्याय ७
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वैशम्पाय़न उवाच
स तु लव्ध्वा पुनः सञ्ज्ञां समुत्थाय़ महीतलात् |  ३   क
समीपोपस्थितं राजा सञ्जय़ं वाक्यमव्रवीत् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति