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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं सुरमणीय़ानि वनान्युपवनानि च |  १०   क
आलोकय़न्तस्ते जग्मुर्विशालां वदरीं प्रति ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति