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विराट पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
कीचकस्य तु घातेन सानुजस्य विशां पते |  १   क
अत्याहितं चिन्तय़ित्वा व्यस्मय़न्त पृथग्जनाः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति