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विराट पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
नरेन्द्र वहुशोऽन्विष्टा नैव विद्मश्च पाण्डवान् |  १३   क
अत्यन्तभावं नष्टास्ते भद्रं तुभ्यं नरर्षभ ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति