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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
वनानि रम्याणि सरांसि नद्यो; गुहा गिरीणां गिरिगह्वराणि |  ५   क
एते निवासाः सततं वभूवु; र्निशानिशं प्राप्य नरर्षभाणाम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति