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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
यं न व्रह्मादय़ो देवा विदुर्यं न महर्षय़ः |  १५१   क
तं स्तव्यमर्च्यं वन्द्यं च कः स्तोष्यति जगत्पतिम् ||  १५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति