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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
यदा जनौघः कुरुजाङ्गलानां; कृष्णां सभाय़ामवशामपश्यत् |  २०   क
अपेतधर्मव्यवहारवृत्तं; सहेत तत्पाण्डव कस्त्वदन्यः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति