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वन पर्व
अध्याय २१२
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मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्ट्वा त्वग्निरथर्वाणं ततो वचनमव्रवीत् |  ८   क
देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्वलः |  ८   ख
अथर्वन्गच्छ मध्वक्षं प्रिय़मेतत्कुरुष्व मे ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति