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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
राजन्किं नाम तत्कृत्यं क्षत्रिय़स्यास्त्यतोऽधिकम् |  २३   क
यद्युद्धेऽभिमुखः प्राणांस्त्यजेच्छत्रूञ्जय़ेत वा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति