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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
विप्रनष्टाश्च तेऽन्योन्यं नाजानन्त तदा विभो |  ९६   क
क्रोशन्तस्तात पुत्रेति दैवोपहतचेतसः ||  ९६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति