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द्रोण पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
सुतसोमस्तु सङ्क्रुद्धः स्वपितृव्यमजिह्मगैः |  २५   क
विविंशतिं शरैर्विद्ध्वा नाभ्यवर्तत दंशितः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति