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द्रोण पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
वार्धक्षेमिं तु वार्ष्णेय़ं कृपः शारद्वतः शरैः |  ४९   क
अक्षुद्रः क्षुद्रकैर्द्रोणात्क्रुद्धरूपमवारय़त् ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति