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वन पर्व
अध्याय २१५
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मार्कण्डेय़ उवाच
सुपर्णी तु वचः श्रुत्वा ममाय़ं तनय़स्त्विति |  ४   क
उपगम्य शनैः स्कन्दमाहाहं जननी तव ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति