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द्रोण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
ततो विस्फार्य नय़ने धनुर्ज्यामवमृज्य च |  ३६   क
तलशव्दं महत्कृत्वा द्रोणस्तं समुपाद्रवत् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति