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कर्ण पर्व
अध्याय २४
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व्रह्मो उवाच
यथा शल्याद्य कर्णोऽय़ं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् |  १२८   क
प्रमथ्य हन्यात्कौन्तेय़ं तथा शीघ्रं विधीय़ताम् |  १२८   ख
त्वय़ि कर्णश्च राज्यं च वय़ं चैव प्रतिष्ठिताः ||  १२८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति